अल्लाह और रब के शुक्र गुज़ार बंदे का खुबसूरत वाक़्या, जब सुल्तान महमूद ग़ज़नवी ने अयाज़ को सुनाया

आज एक तस्वीर शेयर करके उस “अयाज़” को याद किया जा रहा है जो मह़मूद ग़ज़नवी के दाना मुशीर थे..

बात निकली तो अयाज़ का एक मशहूर वाक़्या याद आ गया जो रमज़ान महीने के लिह़ाज़ से बहुत ही मौज़ूं है..सोचा आप सबको भी बताता चलूं..

वाक़्या यह है कि..एक बार मह़मूद ग़ज़नवी के पास ख़रबूज़ा आया तो अयाज़ पास ही बैठे हुए थे..सुल्तान जो कि अयाज़ की बहुत ही क़द्र किया करते थे…ख़रबूज़े को अपने हाथों से छीला और काट-काट कर अयाज़ को पेश करने लगे..

अयाज़ ख़रबूज़ा खाते गये यहां तक कि एक छोटा टुकड़ा सुल्तान के हाथ में बचा रह गया तो सुल्तान ने सोचा कि लाओ इसे मैं खा लूं..

सुल्तान ने ख़रबूज़े का वह छोटा टुकड़ा अभी मुंह में ही रखा था कि कड़वाहट की वजह से उसे थू थू कर थूकना शुरू कर दिया..मुंह साफ करने के बाद सुल्तान ने अयाज़ से कहा…

अयाज़ ख़रबूज़ा इतना कड़वा था..फिर भी तुम उसे खुशी खुशी खा गये…एक बार भी बता दिया होता तो न मैं तुम्हें खिलाता और न ही खुद खाता..आख़िर तुमने शिकायत क्यों नहीं की??

अयाज़ ने कहा…जिन हाथों से दिया हुआ हर रोज़ मैं मीठा खाता हूं…एक दिन उसका दिया हुआ कड़वा खाकर अगर शिकायत करने बैठ जाऊं तो फिर वफादारी कैसी??

यहां हम एक बार अयाज़ की जगह खुद को रखें और सुल्तान की जगह अल्लाह को रखें और सोचें कि क्या हम अपने रब के शुक्र गुज़ार बंदे हैं…सोचिए ! सोचिए !

नोट:- यह पोस्ट फेसबुक से अबू फारिस भाई की टाइमलाइन से ली गई है। यह पोस्ट करने का उद्देश्य अवाम में बेदारी लाना है।

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