रवीश का लेख: जो समाज अपने घर के भीतर हिंसा करता है, उसे मान्यता देता है, वह समाज हिंसा की निंदा क्यों करेगा?

न्यूज़ आध्यात्मिकता क्या है? आपने देखा होगा कि अब ऐसी ख़बरें कम होती हैं जो खोज कर लाई होती हैं। जो सरकार की संस्थानों के भीतर फ़ैसलों की प्रक्रिया का राज़ बाहर कर दें। न्यूज़ संस्थान ऐसी योग्यता रखने वाले पत्रकारों में कम निवेश करते हैं और रखते ही नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि योग्य पत्रकारों की कमी है। दस साल पहले तक ऐसी ख़बरों को लेकर पत्रकारों के बीच जो प्रतिस्पर्धा होती थी वह अब समाप्त हो गई है। सरकार के दबाव को झेलना तो मुश्किल हो ही गया है और सरकार के समर्थक समाज का भी बहिष्कार झेलना पड़ता है। तो न्यूज़ संस्थानों ने ऐसी ख़बरें बंद कर दी हैं या कम से कम कर दी हैं और ऐसी ख़बरें करने वाले पत्रकारों वो विदा कर दिया है। उन्हें अब ऐसे पत्रकार नहीं चाहिए।

उदाहरण के तौर पर आपने देखा होगा कि आर्टिकल 14 नाम की न्यूज़ वेबसाइट ने तीन पार्ट में ख़बरों की सीरीज़ की कि किस तरह से सरकार ने भारतीय रिज़र्व बैंक को अपने क़ब्ज़े में ले लिया है। क़ायदे से इस तरह की रिपोर्ट मुख्यधारा के बड़े मीडिया संस्थान को करनी चाहिए थी लेकिन आर्टिकल 14 ने की जो कुछ जुनूनी पत्रकारों का बनाया संस्थान है। जो अपने जीने के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं और ख़बरों को जनता तक पहुँचाने के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं। तो भारत के अख़बारों में छप क्या रहा है?

ऐसी पत्रकारिता की जगह सरकार के बयान छप रहे हैं। प्रधानमंत्री कहां किस चीज़ का उद्घाटन और सम्मेलन कर रहे हैं इन्हें न्यूज़ बनाकर पेश किया जा रहा है, एक तरह से ये न्यूज़ है भी। मतलब जो हो रहा है उसकी सूचना भर छाप देनी है। ज़मीन पर जाकर सरकार के किए जा रहे दावों की पड़ताल कम हो गई है। आप देखेंगे कि ज़मीन पर पत्रकार कम नज़र आता है और नज़र भी आता है तो वह कई सवालों को छोड़ता हुए किसी तरह साहित्यिक प्रबंधन की मदद से ख़बर बना देता है। यह सभी के साथ है। इसे तोड़ने की ज़िम्मेदारी एक पत्रकार पर डाल कर सो जाना भी ठीक नहीं है। तो यही आज की धारा है। ख़बर नहीं है मगर ख़बर जैसी कुछ है। ऐसी ख़बरों को या ऐसी पत्रकारिता को मैं न्यूज़ आध्यात्मिकता कहता हूँ। महंगाई से जनता मर रही है, स्कालरशिप न मिलने से छात्र रात भर तनाव में नहीं सो रहे हैं मगर कैमरा प्रधानमंत्री के पीछे पीछे घूम रहा है।

न्यूज़ आध्यात्मिकता के तहत मैंने प्राइम टाइम में स्वामी सीरीज़ शुरू की है। जब समाज ही समस्याओं को नकार दे तब अपना टाइम कैसे काटा जाए तो इसका एक विकल्प खोजा है। मगर इसमें भी कुछ चीज़ें मिल गईं जिनसे समझने लगा कि जो समाज अपने घर के भीतर इतनी तरह की हिंसा करता है, उसे मान्यता देता है, बर्दाश्त करता है वह समाज घर के बाहर की हिंसा को क्यों नकारेगा। क्यों उसकी निंदा करेगा। धर्म के गौरव के नाम पर एकजुट महिलाओं से आप पूछें कि घर के भीतर सबका भारत है या एकतरफ़ा भारत है? कुछ तो है तो घरों के भीतर संस्कार और परंपरा के नाम पर क़ैद औरतें धर्म के गौरव में गौरवशाली महसूस करती हैं। पति की हिंसा को सही मानने लगती हैं।

ऐसे में बेहतर है स्क्रीन के सामने भी रहा जाए और ख़बरों से दूर भी। आध्यात्मिक होकर न्यूज़ के नाम पर गौरवशाली भारत के वर्णन से टाइम काट लिया जाए। जब सूचनाएँ ही नहीं हैं, ख़बरें ही नहीं हैं तो कोई क्या करें। जैसा भारत, सबका भारत। है कि नहीं। मेरे लिए कोई अलग भारत थोड़े न बन कर आएगा। तो अब से यही नारा है, जैसा भारत, सबका भारत।

(लेखक जाने माने पत्रकार हैं, यह लेख उनके फेसबुक पेज से लिया गया है)

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