रवीश कुमार का लेख: बुलडोजर देखकर नाचने वाले एक छोटी सी पर्ची पर लिखकर पर्स में रख लें कि वो इंसान नही….

क्या बुलडोज़र एकतरफा भारत का नया प्रतीक है? ग़रीबों के घर पर या उनके मोहल्ले में जितनी आसानी से बुलडोज़र चल जाते हैं क्या अमीरों के मोहल्ले में चल सकते हैं? क्या दिल्ली के RWA के प्रेसिडेंट अपनी-अपनी सोसायटी में बुलडोज़र वालों को बुला सकते हैं कि आइये हमारे यहां देखिए और अतिक्रमण पर बुलडोज़र चला दीजिए?

क्या उन्हें नहीं पता कि उनकी सोसायटी के भीतर किस किस ने अतिक्रमण किया है? क्या इस दिल्ली में जब लोगों ने एक मंज़िल अधिक बना ली गई तब उसे मान्यता नहीं दी गई? डबल स्टोरी का आंदोलन नहीं चला? इस दिल्ली की आधी से अधिक आबादी जो झुग्गियों, बस्तियों और अवैध कालोनियों में रहती है, क्या उसे नहीं मालूम कि उसके लिए डिमोलिशन का क्या मतलब होता है?

गोदी मीडिया नाच रहा है, आपको पता रहा है कि कानून का पालन हो रहा है लेकिन आप भी जानते हैं कि क्या हो रहा है। मज़हब और राजनीति के रंग से बुलडोज़र का स्वागत करने वाले आज उन लाखों लोगों से ख़ुद को अलग कर रहे हैं जिन बस्तियों से निकल कर उनके घरों, दफ्तरों और दुकानों में काम करने आते हैं। जिनसे आपका काम चलता है उन्हीं के घर पर बुलडोज़र आतंक बन कर नाचने लगे और उसे देखकर जब आप नाचने लगे तो एक छोटी सी पर्ची पर लिख कर पर्स में रख लीजिए कि आप इंसान नहीं रहे।

अगर प्रशांत भूषण और दुष्यंत दवे अपनी नागरिक ज़िम्मेदारी को निभाते हुए सुप्रीम कोर्ट नहीं गए होते तो जहांगीरपुरी के कितने ही मकान मिट्टी में मिल गए होते। इस शहर में अच्छे वकीलों की कमी नहीं लेकिन इन दोनों ने जहांगीरपुरी के ग़रीबों के घरों को बचाने के लिए अदालत के सामने एड़ी चोटी एक कर दी। चीफ जस्टिस ने गुरुवार की सुनवाई तक अतिक्रमण हटाने पर रोक लगा दी।

उसके बाद भी अतिक्रमण का हटाना जारी रहा, इस दलील के साथ कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश नहीं मिला है। जिस देश में सरकार इस बात पर सीना फुलाती है कि लोग डिजिटल बैंकिंग कर रहे हैं उस देश की राजधानी में चंद किलोमीटर दूर सुप्रीम कोर्ट का आदेश नहीं पहुंच सका। नतीजा तोड़फोड़ जारी रही और एक बार फिर से दुष्यतं दवे को चीफ जस्टिस के सामने गुहार लगानी पड़ी कि कोर्ट के आदेश के बाद तोड़फोड़ नहीं रोकी गई है।

दवे कहते रहे कि मीडिया में इसकी सूचना के आने के बाद भी ये लोग रुके नहीं है। यह उचित नहीं है। दुष्यंत दवे ने चीफ जस्टिस से कहा कि मुझे यह कहते हुए दुख हो रहा है कि दुनिया को पता है कि आपने रोक लगाई है लेकिन वे रूक नहीं रहे हैं। इससे ग़लत संदेश जाता है। तब चीफ जस्टिस ने सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री के अधिकारियों को आदेश दिया कि तुरंत अफसरों को आदेश की सूचना दी जाए। इसके बाद जाकर तोड़फोड़ रोकी जाती है तब तक कई हिस्सों में तोड़फोड़ की जा चुकी थी।

मध्य प्रदेश के खरगोन में इसी तरह हिंसा के बाद तुरंत अतिक्रमण बताकर बुलडोज़र चला दिया गया, इस होड़ में उनका भी मकान गिरा दिया गया जिन्होंने प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर बनाया था। क्या यह उसी पैटर्न का हिस्सा है, या वाकई दिल्ली में ईमानदारी से अतिक्रमण हटाने का अभियान चलने वाला है। RWA के प्रेसिडेंट खुद से अपने अपने मोहल्ले की लिस्ट सौंप देंगे, कि आइये बुलडोज़र चलाइये, अगर ये एकतरफा भारत नहीं है तो चौतरफा कार्रवाई क्यों नहीं होती है।

दिल्ली में अतिक्रमण के इतिहास को समझना होगा। विभाजन के बाद पाकिस्तान से आए शरणार्थियों के लिए कालोनी तैयार नहीं थी, बहुत से लोग वहां भी बसे जिसे आप आज की भाषा में अवैध कह सकते हैं। आपातकाल के समय से ही दिल्ली को खूबसूरत बनाने के नाम पर कथित रुप से अवैध बस्तियों को उजाड़ने का अभियान चलता रहा है। शहरी लोगों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले लोगों ने सुप्रीम में याचिकाएं दायर की। 2010 में सुदामा सिंह में दिल्ली हाई कोर्ट ने फैसला दिया कि किसी बस्ती को उजाड़ने के क्या नियम होंगे और उन्हें फिर से बसाना भी होगा।
रवीश कुमार

Leave a Comment