रमज़ान में शैतान का क़ैद होना, क़ुरआन ने यूँ फ़रमाया है : “फिर उसकी बदी और उसकी परहेज़गारी उस पर इलहाम कर दी”

रमज़ान में शैतान का क़ैद होना, क़ुरआन ने यूँ फ़रमाया है : “फिर उसकी बदी और उसकी परहेज़गारी उस पर इलहाम कर दी”
_________

हदीस-ए-रसूल ﷺ है :
“रमज़ान में शैतान क़ैद कर दिये जाते हैं”
[बुख़ारी – 3277]

दरअसल अल्लाह ने हमारे इम्तिहान और हमारी आज़माईश के लिये हमारे साथ एक तो ख़ारजी (outsider) शैतान लगा रखा है जो अल्लाह की मख़लूक़ इबलीस की ज़ुर्रियत में से है और दूसरी चीज़ हमारे बातिन में हमारा वह नफ़्स, जो हमें बुराई पर उकसाता है. यही नफ़्स अंदरूनी (insider) शैतान का काम करता है.

हर इंसान के अंदर अल्लाह ने उसकी पैदाइश के साथ ही दो चीज़ें रख दी हैं, जिसको क़ुरआन ने यूँ फ़रमाया है :
“फिर उसकी बदी और उसकी परहेज़गारी उस पर इलहाम कर दी”
[सूरह शम्स/91, आयत/8]

यानी अल्लाह यह बता रहा है कि इस इंसानी नफ़्स को जब हमने तख़लीक़ कर के इसको दुरुस्त कर दिया तो इसके अंदर इसकी पैदाइश के साथ ही यह चीज़ भी रख दी कि यह बुराई के रास्ते पर भी जा सकता है और यह भलाई के रास्ते पर भी जा सकता है. इसके अंदर बुराई पर उभारने वाले दाईयात भी मौजूद हैं और नेकी व ख़ैर की तरफ़ उभारने वाले दाईयात भी इसके अंदर मौजूद हैं.

रमज़ान में जो शैतान क़ैद होता है, दरअसल यह वही ख़ारजी शैतान है जो इबलीस की ज़ुर्रियत में से है. मतलब बाहर से हमें बहकाने और गुनाह पर उकसाने वाला अब पूरे रमज़ान भर कोई शैतान नहीं है.

तो फिर हमसे रमज़ान में गुनाह क्यों होते हैं?
उसका ज़िम्मेदार है हमारे बातिन में मौजूद बुराई पर उभारने वाला शैतान, जो नफ़्स की सूरत में हमारे अंदर मौजूद है. वह कहीं भी नहीं मरता है और न ही गिरफ्तार होता है. वह तो अपना काम करता रहता है सुबह-शाम, दिन-रात. उसको अल्लाह ने पाबंद नहीं किया है क्योंकि अगर वह पाबंद हो जाएगा तो फिर हमारा इम्तिहान ही ख़त्म हो जाएगा. वह अल्लाह के दिये हुए अख़्तियार के तहत बुराई की तरग़ीब भी देता है और भलाई की तरग़ीब भी देता है. रमज़ान में इस शैतान को क़ैद नहीं किया जाता है. इस शैतान को क़ैद करने के लिये तो इंसान को मारना ज़रूरी है. क्योंकि इंसान के अंदर नफ़्स जो पैदा किया गया है यह चीज़ उसकी पैदाइश के साथ ही उसको दे दी गई है.

अलबत्ता अल्लाह का तरीक़ा यह है जो आम ज़िंदगी में वह अख़्तियार करता है कि जब हम अपने बातिन से यह फ़ैसला कर लेते हैं कि हमें अच्छाई करनी है, हम इरादा कर लेते हैं कि हमें कोई नेक काम करना है. फ़ैसला तो हम करते हैं, इरादा तो हमारे अंदर से पैदा होता है. तो जैसे ही हम उस फ़ैसले की तरफ़ क़दम बढ़ाते हैं तो अल्लाह पहले यह देखता है कि इसने वाक़ई यह इरादा किया है, वाक़ई इस्तिक़ामत है, वाक़ई यह इस रास्ते पर चलना चाहता है तो अल्लाह अपने फ़रिश्तों से कहता है कि इसकी मदद करो. नेकी के इरादे के मामले में यह अल्लाह की सुन्नत है. इसी को अल्लाह फ़रमाता है कि जब तुम नेकी का इरादा कर लेते हो तो मैं तुम्हें मंज़िल तक पहुँचाता हूँ.

इसके बिल्कुल बरख़िलाफ़ जब हम बुराई का इरादा करते हैं तो इरादा हम ही करते हैं, हमारे ही बातिन से फ़ैसला होता है, हम इस इरादे पर क़दम आगे बढ़ाते हैं तो अल्लाह हमें मोहलत देता है, वह यह देखता है कि हो सकता है कि हम अपना इरादा वापस ले लें. लेकिन जब यह मालूम हो जाता है कि हमने पक्का इरादा कर लिया है और हम अब इसी रास्ते पर चलना चाहते हैं तो अल्लाह शयातीन को यह इजाज़त दे देता है कि वो जाएँ और वो भी वही काम करें जो नेक इरादे के बाद फ़रिश्ते करते हैं. तो रमज़ान में यह दूसरा काम बंद होता है, पहला काम बंद नहीं होता.

Leave a Comment